अध्यापन, जितना बाल केन्द्रित होना आवश्यक है , उतना ही मस्तिष्क केन्द्रित
होना भी। इससे विद्यार्थी खुद को पहचानने में ज्या होने वाला वक्त और होने
वाली देरी दोनों से निज़ात होंगे , साथ ही साथ विद्यार्थियों में कुछ कर
गुजरने का जज्बा निश्चित होने के साथ ही साथ सुनिश्चित भी होगा।
इसप्रकार
के अध्यापन का परिणाम यह होगा कि विद्यार्थियों के मन-मस्तिष्क में सपनों
की सफलता और असफलता की ऊहापोह की स्थिति खत्म होगी। अगर इंसान इसके बावजूद
भी असफल रह जाता है , तो जो ज़िन्दगी उसने अपने सपनों के साथ जी है, वह
ज़िन्दगी उसे ताउम्र सुख तथा आत्मसंतुष्टि देती रहेगी।
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